बेमौसम बारिश से मुरझाए किसानों के चेहरे, 8 हजार हेक्टेयर से ज्यादा खरीफ की फसल बर्बाद, बागवानी को भी नुकसान

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बारिश ने न सिर्फ किसानों की उम्मीदों पर पानी फेरा है, बल्कि उनके सामने आर्थिक संकट भी खड़ा कर दिया है. रिपोर्ट- धीरज सजवाण

देहरादून: उत्तराखंड से मॉनसून भले ही विदा हो चुका हो, लेकिन मौसम की मार अभी भी जारी है. उत्तराखंड में अतिवृष्टि और ओलावृष्टि से किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचा है. कृषि विभाग के अनुसार इस साल आपदा में खरीफ का करीब 8,372 हेक्टेयर से अधिक कृषि क्षेत्र प्रभावित हुआ है. सबसे ज्यादा नुकसान ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार में हुआ है.

वहीं, पहाड़ी जिलों में बागवानी फसलों, सब्जियों और पॉलीहाउस को भी नुकसान पहुंचा है. प्रभावित क्षेत्रों में नुकसान का आकलन और सर्वे की कार्रवाई जारी है. कृषि मंत्री गणेश जोशी ने नियमानुसार मुआवजा देने का भरोसा दिया है, जबकि प्रभावित किसानों ने नुकसान की भरपाई की मांग उठाई है.

मैदानी जिलों में सबसे अधिक नुकसान: कृषि निदेशालय की 9 अक्टूबर 2026 तक की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में आपदा और अतिवृष्टि आदि से खरीफ 2026 की फसलों का कुल 8,372.308 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित दर्ज किया गया है. आंकड़ों के मुताबिक नुकसान का सबसे बड़ा हिस्सा ऊधमसिंह नगर जिले में है, जहां बाजपुर और गदरपुर क्षेत्रों में लगभग 7,730 हेक्टेयर में धान और गन्ने की फसल प्रभावित हुई है.

इसके बाद हरिद्वार में करीब 600.133 हेक्टेयर कृषि क्षेत्र प्रभावित दर्ज किया गया है. यहां मुख्य रूप से धान की फसल को नुकसान पहुंचा है. इन दोनों जिलों को मिलाकर प्रदेश के दर्ज प्रभावित कृषि क्षेत्रफल का लगभग 99.5 प्रतिशत हिस्सा सामने आता है. इससे स्पष्ट होता है कि कृषि विभाग के उपलब्ध रिकॉर्ड में नुकसान का बड़ा हिस्सा मैदानी जिलों में केंद्रित है. यह आंकड़ा प्रभावित क्षेत्रफल का है, इसे पूरी तरह बर्बाद हुई फसल के क्षेत्रफल के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. विभागीय रिपोर्ट में प्रभावित क्षेत्र और क्षति की अलग-अलग श्रेणियां दर्ज हैं, जिनका अंतिम मिलान भी जरूरी है.

खरीफ फसलों को नुकसान:

  • कुल प्रभावित कृषि क्षेत्रफल- 8,372.308 हेक्टेयर
  • ऊधमसिंह नगर- 7,730 हेक्टेयर
  • हरिद्वार- 600.133 हेक्टेयर
  • अन्य जिलों में दर्ज प्रभावित क्षेत्रफल- लगभग 42.175 हेक्टेयर

ऊधमसिंह नगर में धान और गन्ने पर सबसे ज्यादा असर: कृषि विभाग के आंकड़ों में अनुसार अतिवृष्टि और ओलावृष्टि से ऊधमसिंह नगर जिले का बाजपुर और गदरपुर क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित दिखाई दे रहे हैं. इन दोनों क्षेत्रों के कई गांवों में धान और गन्ने की फसल को नुकसान दर्ज किया गया है.

रिपोर्ट में बेरिया दौलत, चंदनपुरा, महोली जंगल, मड़इया हट्टू, बांसखेड़ी, बन्नाखेड़ा, बरहैनी, हुलसनगंज, खमरिया, शिवपुरी, टांडा महमूद और आसपास के अनेक गांवों का जिक्र है. विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार इस क्षेत्र में प्रभावित कृषि भूमि का क्षेत्रफल 7,730 हेक्टेयर है.

हरिद्वार की रिपोर्ट: हरिद्वार में बहादराबाद क्षेत्र के अंतर्गत बहादराबाद, फेरुपुर और बादशाहपुर में करीब 600.133 हेक्टेयर कृषि क्षेत्र प्रभावित दर्ज किया गया है. यहां मुख्य रूप से धान की फसल शामिल है. धान की कटाई के आसपास बारिश होने से फसल की गुणवत्ता, कटाई और उपज पर क्या असर पड़ा है, इसकी स्थिति किसानों से बातचीत और स्थानीय स्तर पर सर्वे के बाद ही स्पष्ट होगी.

इसी तरह गन्ने की फसल को हुए नुकसान का वास्तविक आर्थिक आकलन सामने आना बाकी है. ऐसे में प्रभावित क्षेत्रफल के साथ किसानों की संख्या, उत्पादन में संभावित कमी और राहत की स्थिति के आंकड़े भी महत्वपूर्ण होंगे.

मैदानी जिलों में नुकसान:

  • ऊधमसिंह नगर: धान और गन्ना
  • हरिद्वार: मुख्य रूप से धान
  • ऊधमसिंह नगर के प्रभावित क्षेत्र: बाजपुर और गदरपुर
  • हरिद्वार के प्रभावित क्षेत्र: बहादराबाद, बादशाहपुर और आसपास के क्षेत्र

पहाड़ में बागवानी फसलों को 70 प्रतिशत तक नुकसान: अतिवृष्टि और ओलावृष्टि का असर केवल कृषि फसलों तक सीमित नहीं है. कृषि मंत्री गणेश जोशी के कार्यालय से 10 अक्टूबर को जारी प्रेस नोट के अनुसार पहाड़ी जिलों में बागवानी फसलों को भी नुकसान पहुंचा है. अल्मोड़ा के चौखुटिया और लमगड़ा विकासखंड में बागवानी फसलों को 15 से 70 प्रतिशत तक नुकसान होने की जानकारी दी गई है.

चम्पावत जिले के चम्पावत, पाटी, लोहाघाट और बाराकोट विकासखंड में 33 प्रतिशत से अधिक क्षति दर्ज की गई है. इसी तरह नैनीताल के हल्द्वानी, कोटाबाग और रामनगर क्षेत्रों में बागवानी फसलों को लगभग 10 प्रतिशत नुकसान का आकलन किया गया है. वहीं, देहरादून के रायपुर विकासखंड में 10 से 15 प्रतिशत, रुद्रप्रयाग में करीब 20 प्रतिशत और टिहरी के घनसाली क्षेत्र में लगभग 30 प्रतिशत तक नुकसान बताया गया है.

पौड़ी गढ़वाल के कोटद्वार क्षेत्र के अंतर्गत नैनीडांडा और रिखणीखाल विकासखंड में भी करीब 30 प्रतिशत नुकसान का आकलन किया गया है. हालांकि, ये प्रतिशत संबंधित क्षेत्रों में दर्ज प्रारंभिक आकलन हैं, पूरे जिले की फसलों का नुकसान नहीं. बागवानी क्षेत्र में वास्तविक क्षति का पता लगाने के लिए प्रभावित बागानों, फसलों और किसानों का विस्तृत विवरण जरूरी होगा. उद्यान विभाग के समेकित आंकड़े आने के बाद नुकसान की व्यापक तस्वीर सामने आ सकेगी:

बागवानी फसलों को नुकसान-

  • अल्मोड़ा: 15–70 प्रतिशत
  • चम्पावत: 33 प्रतिशत से अधिक
  • नैनीताल: लगभग 10 प्रतिशत
  • देहरादून: 10–15 प्रतिशत
  • रुद्रप्रयाग: लगभग 20 प्रतिशत
  • टिहरी और पौड़ी: लगभग 30 प्रतिशत

किसान ने सेब और सब्जियों की फसल के नुकसान पर मांगा मुआवजा: बेमौसम बारिश का असर पहाड़ी क्षेत्रों में सेब और सब्जियों की खेती पर भी पड़ा है. देहरादून जिले के चकराता क्षेत्र के त्यूनी स्थित ग्राम सिड़िया के किसान जोगेंद्र सिंह के मुताबिक इस बार बारिश के कारण सेब की फसल के साथ टमाटर, शिमला मिर्च, फूलगोभी और बंदगोभी जैसी सब्जियों को काफी नुकसान हुआ है. जोगेंद्र सिंह ने सरकार से प्रभावित किसानों को मुआवजा देने की मांग की है. पहाड़ में कई किसान अपनी आजीविका के लिए बागवानी और मौसमी सब्जियों पर निर्भर हैं. ऐसे में फसल प्रभावित होने का असर उनकी मौजूदा सीजन की कमाई के साथ अगली फसल की तैयारी पर भी पड़ सकता है.

नुकसान पर पूरा आकलन करना जरूरी: किसान की मांग है कि नुकसान का आकलन कर प्रभावित परिवारों को राहत दी जाए. हालांकि त्यून क्षेत्र में सेब और सब्जियों का कुल कितना क्षेत्र प्रभावित हुआ है, कितने किसान नुकसान की जद में आए हैं और आर्थिक क्षति कितनी है, इसके आधिकारिक आंकड़े अभी उपलब्ध नहीं हैं. इसलिए स्थानीय स्तर पर सर्वे और किसानों से मिली जानकारी को विभागीय आंकड़ों से जोड़ना जरूरी होगा, ताकि क्षेत्र में नुकसान की वास्तविक तस्वीर सामने आ सके.

केंद्र के मानकों के तहत मुआवजा, राज्य सरकार भी देगी अतिरिक्त सहायता: कृषि मंत्री गणेश जोशी के अनुसार, प्रभावित किसानों को केंद्र सरकार के निर्धारित मानकों के तहत मुआवजा दिया जाएगा. केंद्र सरकार के मानकों के अनुसार 17 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर या नियमों के तहत निर्धारित राशि के आधार पर सहायता उपलब्ध कराई जाएगी. केंद्र से मिलने वाली सहायता के अतिरिक्त राज्य सरकार भी प्रभावित किसानों के साथ खड़ी है और उनकी स्थिति के अनुसार उचित मदद प्रदान करेगी.

कृषि मंत्री के कार्यालय से जारी प्रेस नोट के अनुसार, प्रारंभिक सर्वे किया जा चुका है और विभागीय कार्मिकों व राजस्व विभाग के साथ संयुक्त सर्वे की कार्रवाई जारी है. जिन किसानों ने फसल बीमा कराया हुआ है, उनकी क्षति संबंधी रिपोर्ट बीमा कंपनियों को भेजे जाने की जानकारी भी दी गई है.

2030 तक कश्मीर और हिमाचल के बराबर बागवानी का लक्ष्य: बारिश से हुए नुकसान के बीच कृषि मंत्री गणेश जोशी ने उत्तराखंड में बागवानी को बढ़ावा देने की योजनाओं का भी उल्लेख किया है. उनके अनुसार, सरकार कीवी और सेब के उत्पादन को बढ़ाने के लिए काम कर रही है और आने वाले समय में हाई-डेंसिटी बागवानी पर विशेष जोर दिया जाएगा. हाई-डेंसिटी बागवानी में निर्धारित तकनीक और उपयुक्त किस्मों के माध्यम से कम क्षेत्र में अधिक पौधे लगाकर उत्पादन बढ़ाने का प्रयास किया जाता है.

मंत्री ने लक्ष्य रखा है कि वर्ष 2030 तक उत्तराखंड बागवानी के क्षेत्र में कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के बराबर पहुंच सके. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उत्पादन बढ़ाने के साथ पौधों की गुणवत्ता, मौसम के जोखिम, सिंचाई, बाजार तक पहुंच और किसानों को तकनीकी सहायता जैसे पहलुओं पर भी काम करना होगा. बेमौसम बारिश से प्रभावित किसानों की तत्काल राहत और दीर्घकालीन बागवानी विकास दो अलग-अलग जरूरतें हैं. इसलिए जहां एक ओर वर्तमान नुकसान का सही आकलन और नियमानुसार सहायता जरूरी है, वहीं दूसरी ओर बागवानी को बढ़ावा देने वाली योजनाओं का लाभ किसानों तक पहुंचाना भी महत्वपूर्ण होगा.