चुनाव से पहले दलबदल करने वाले नेताओं में से कुछ को तार गई होशियारी तो कुछ की नहीं लगी नैया पार

Politics Uttarakhand

उत्‍तराखंड में पांच साल सत्ता की मलाई और फिर एंटी इनकंबेंसी के डर से दल बदलने की होशियारी इस बार कई नेताओं और प्रत्याशियों पर भारी पड़ गई। विश्वसनीयता के संकट के बीच जीत के मोर्चे पर भी उन्हें मायूसी हाथ लगी है। ऐसे आठ प्रत्याशी चुनाव जीतने के लिए तरस गए। वहीं कई प्रत्याशी ऐसे भी रहे, जिन्हें यही होशियारी चुनावी नैया पार लगाने में मददगार बनी।
बीती 10 मार्च को घोषित चुनाव परिणाम कई मायने में चौंकाने वाले रहे हैं। चुनाव से ठीक पहले पूर्व मंत्री डा हरक सिंह रावत ने भाजपा को बाय-बाय कर कांग्रेस का दामन थाम लिया। भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहते हुए महत्वपूर्ण विभागों का जिम्मा संभालने वाले हरक सिंह ने इस चुनाव तक पार्टी में रहना मुनासिब नहीं समझा। कांग्रेस में उनकी वापसी के हफ्तेभर से ज्यादा चले नाटकीय घटनाक्रम के बाद उन्होंने खुद चुनाव नहीं लड़ा। अपनी जगह पुत्रवधू अनुकृति गुसाईं को लैंसडौन सीट से उन्होंने कांग्रेस का टिकट तो दिलाया, लेकिन जीत नहीं दिला सके।

यशपाल जीते, हार गए संजीव:
पूर्व मंत्री यशपाल आर्य भी इसी राह पर आगे बढ़े। उन्होंने चुनावी साल में अपने विधायक पुत्र के साथ भाजपा छोड़कर कांग्रेस में वापसी की। हालांकि यशपाल स्वयं तो बाजपुर सीट से चुनाव जीत गए, लेकिन नैनीताल सीट पर उनके पुत्र संजीव आर्य को पराजय झेलनी पड़ी। नैनीताल की यह सीट दलबदल के चलते रोचक संघर्ष का गवाह बनी। इस सीट पर कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुईं सरिता आर्य के सिर पर जीत का ताज सजा।

उलट-पलट की गवाह बनी टिहरी सीट:
टिहरी सीट पर भी उलट-पलट हुआ। कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले किशोर उपाध्याय ने टिहरी सीट पर जीत दर्ज की। वहीं उनके आने के बाद भाजपा छोड़कर कांग्रेस का रुख करने वाले पूर्व विधायक धन सिंह नेगी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव तो लड़े, लेकिन जीत को तरस गए।
उत्तरकाशी जिले की पुरोला व यमुनोत्री सीट पर भी दलबदलुओं की जंग ने ध्यान खींचा है। पुरोला सीट पर भाजपा छोड़कर कांग्रेस के टिकट से चुनाव लडऩे वाले मालचंद कांग्रेस से भाजपा में गए दुर्गेश लाल से पराजित हुए। यमुनोत्री सीट पर दीपक बिजल्वाण ने भी चुनाव के मौके पर कांग्रेस का दामन तो थामा, लेकिन जीत उनके हाथ भी नहीं लगी।

अल्मोड़ा, रानीखेत और लालकुआं को सुहाया दलबदल:
अल्मोड़ा भी ऐसी ही जंग का हिस्सा बना। अल्मोड़ा जिले की जागेश्वर

सीट से कांग्रेस के मोहन सिंह मेहरा सालभर पहले भाजपा में शामिल हो गए थे। पार्टी ने उन्हें टिकट दिया तो उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता गोविंद सिंह कुंजवाल को चुनाव मैदान में चित कर दिया।
रानीखेत सीट से प्रमोद नैनवाल को पिछले चुनाव में भाजपा ने निकाल दिया था। पार्टी ने उन्हें वापस लिया और चुनाव लड़ाया। नैनवाल उप नेता प्रतिपक्ष करन माहरा पर भारी पड़े और जीत गए। यही स्थिति नैनीताल जिले की लालकुआं सीट पर हुई। चुनाव के मौके पर भाजपा में वापसी करने वाले डा मोहन ङ्क्षसह बिष्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को हरा दिया।

बसपा भी रही इस खेल की हिस्सेदार:
भाजपा और कांग्रेस ही नहीं, बसपा भी ऐसे ही अनुभव से गुजरी है। ऐन चुनाव के मौके पर कांग्रेस छोड़कर बसपा में गए पूर्व विधायक नारायण पाल ऊधमसिंहनगर जिले की सितारगंज सीट से चुनाव लड़े, लेकिन हारे। हरिद्वार जिले की भगवानपुर सीट पर भाजपा के टिकट पर पिछला चुनाव लडऩे वाले सुबोध राकेश इस बार बसपा के टिकट पर लड़े, लेकिन जीत नहीं सके।

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